सामान्य बीमा

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सामान्य बीमा

सामान्य बीमा क्या है?

What is General Insurance?

‘जीवन बीमा’ को छोड़कर अन्य बीमा सामान्य बीमा के तहत आते हैं. सामान्य बीमा में आगजनी, चोरी आदि के लिए संपत्ति का बीमा, वैयक्तिक बीमा जैसे की दुर्घटना एवं स्वास्थ्य बीमा और विधिक देयताओं को कवर करने के लिए देयता बीमा शामिल है. अन्य कवर जैसे कि पेशेवरों के लिए भूल-चूक बीमा, क्रेडिट इंश्योरेंस आदि भी इसके तहत कवर किए जाते हैं.

गैर-जीवन बीमा कंपनियों के पास ऐसे उत्पाद हैं जो आगजनी और संबन्धित आपदाएँ, बाढ़ तूफान, सैलाब, भूकंप और इसी तरह की कई आपदाओं से क्षति होने पर संपत्ति को सुरक्षा प्रदान (कवर) करती हैं. गैर-जीवन बीमा कंपनियाँ मशीनरी के टूट-फूट और खराबी को कवर करने के लिए भी पॉलिसी ऑफर करती हैं. ऐसी भी पॉलिसियाँ हैं जो जलपोत को भी कवर करती हैं. मरीन कार्गो पॉलिसी में समुद्र, सड़क और वायु मार्ग द्वारा ढोये जा रहे सामानों को कवर किया जाता है. साथ ही, मोटर वाहन की टूटफूट और चोरी को कवर करने के लिए किया जाने वाला इंश्योरेंस (बीमा) गैर जीवन बीमा कारोबार का एक बड़ा हिस्सा है.

संपत्ति के इंश्योरेंस के संबंध में यह महत्वपूर्ण है कि संपत्ति के वास्तविक मूल्य के लिए कवर लिया जाये ताकि दावा प्रस्तुत करते समय किसी तरह के दंड के भुगतान से बचा जा सके. इंश्योरेंस के उद्देश्य से यदि संपत्ति के मूल्य को कम करके आँका गया है तो बीमाकृत व्यक्ति को कर योग्य अनुपात में हानि वहन करनी होगी. उदाहरणस्वरूप यदि संपत्ति का मूल्य 100 रु. है और इसका बीमा 50 रु. के लिए है तो 50/-रु. तक की क्षति होने की स्थिति में अधिकतम दावा राशि के रूप में 25/- रु (वास्तविक संपत्ति का मूल्य 50% कम कर के बीमा करवाने के चलते क्षति के 50% का वहन बीमाकृत व्यक्ति द्वारा किया जाएगा) ही देय होगा. अधिकतर बीमाकृत व्यक्ति इस बात पर ध्यान नहीं देते हैं.

लाभदायक पॉलिसी होते हैं. गैर जीवन बीमाकर्ताओं द्वारा स्वास्थ्य बीमा कवर किया जाता है जो प्रमुखतया अस्पताल में भरती होने की स्थिति में प्रतिपूर्ति या नकदीरहित व्यवस्था पर आधारित होता है. नकदीरहित सेवा का प्रबंधन थर्ड पार्टी द्वारा किया जाता है जिनका विभिन्न सेवा प्रदाताओं जैसे अस्पताल आदि के साथ आपसी गठजोड़ रहता है. थर्ड पार्टी प्रबन्धकों द्वारा प्रतिपूर्ति दावा के लिए भी सेवा उपलब्ध कराई जाती है. कभी-कभी बीमा कंपनियाँ स्वयं भी प्रतिपूर्ति दावा को प्रोसेस करती हैं.

दुर्घटना एवं स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी वैयक्तिक एवं समूह के लिए उपलब्ध है. समूह के रूप में किसी संगठन के कर्मचारियों का समूह या क्रेडिट कार्ड धारकों या किसी बैंक के जमाधारकों का समूह हो सकता है. सामान्यतः जब किसी समूह के लिये कवर लिया जाता है तो बीमा कम्पनियां समूह बीमा के लिये कुछ रियायतें भी देती हैं.

दायित्व बीमा कवर जैसे कि मोटर थर्ड पार्टी देयता बीमा, कर्मचारी क्षतिपूर्ति देयता आदि विधिक देयताएं, जो मोटर वाहन अधिनियम, कामगार क्षतिपूर्ति अधिनियम आदि से संबन्धित सांविधिक प्रावधानों के तहत आती हैं, के लिए कवर प्रदान करने हेतु ऑफर दिया जाता है. कुछ कवर, जैसे कि पूर्ववर्ती मोटर थर्ड पार्टी एवं कामगार क्षतिपूर्ति पॉलिसी सांविधिक रूप से अनिवार्य हैं. वैसी दायित्व बीमा जो सांविधिक रूप से अनिवार्य नहीं हैं वो भी आजकल प्रचलित हो रही है. कई उद्योग सार्वजनिक (पब्लिक) दायित्व के लिए बीमा करवाते हैं. ऐसे कई दायित्व कवर उत्पाद के लिए भी उपलब्ध हैं.

कई ऐसे सामान्य बीमा उत्पाद भी हैं जो पैकेज पॉलिसी स्वरूप के है और ऊपर उल्लिखित कई कवर को एक साथ मिलाकर भी ऑफर देते हैं. उदाहरण स्वरूप गृह स्वामी, दुकानदार, तथा पेशेवर जैसे डॉक्टर, चार्टड अ काउंटेंट आदि के लिए पैकेज पॉलिसी उपलब्ध है. स्टैंडर्ड कवर ऑफर के अलावा भी बीमा कंपनियाँ जरूरत के मुताबिक या विशिष्ट रूप से निर्मित ऑफर भी देती हैं.

प्रत्येक परिवार के लिए उचित सामान्य बीमा कवर आवश्यक है. मेहनत से अर्जित की गई अपनी संपत्ति की रक्षा करना अति आवश्यक है. स्वयं की संपत्ति के नुकसान होने या किसी प्रकार की क्षति होने पर मानसिक तनाव हो सकता है. प्राकृतिक आपदाओं जैसे सुनामी, भूकंप, चक्रवात, आदि से क्षति होने पर कई लोग बेघर और कंगाल हो जाते हैं. इस तरह की क्षति को रोका तो नहीं जा सकता परंतु बीमा द्वारा हानि के नुकसान को काफी कम किया जा सकता है. जिस तरह संपत्ति को कवर किया जाता है वैसे ही व्यक्ति को वैयक्तिक दुर्घटना से कवर किया जा सकता है. स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी, बीमारी और आकस्मिक चोट के चलते उपचार पर आने वाली खर्च से व्यक्ति को राहत प्रदान करती है.

उद्योग को भी अपने भवन, मशीनरी, स्टॉक आदि के लिए बीमा द्वारा अपने को सुरक्षित करना होता है. उन्हें अपने दायित्वों को भी कवर करने की आवश्यकता होती है. वित्तपोषक भी बीमा के लिए ज़ोर डालते हैं. अतः बैंक और अन्य संस्थानों द्वारा वित्तपोषित अधिकतर उद्योग और व्यवसाय बीमा कवर लेते हैं. परंतु क्या वे सही कवर ले रहे हैं? तथा क्या वे बीमा द्वारा पर्याप्त रूप से कवर हो रहे हैं ये कुछ प्रश्न है जिस पर विचार करना आवश्यक है. संगठन या उद्योग जो स्व-वितपोषित है उन्हें भी बीमा द्वारा सुरक्षित होना चाहिए.

अधिकतर सामान्य बीमा कवर वार्षिक करार आधारित होते हैं. तथापि, कुछ उत्पाद ऐसे हैं जो लंबी अवधि के लिए भी हैं.

यह सभी के लिए महत्वपूर्ण है कि बीमा करार करने के पहले पॉलिसी के नियम एवं शर्तों को अच्छी तरह से पढ़ एवं समझ लेना चाहिए. प्रस्ताव फॉर्म स्पष्ट एवं पूर्ण रूप से भरा जाना चाहिए एवं यह सुनिश्चित कर लिया जाना चाहिए कि कवर जरूरत के मुताबिक एवं पर्याप्त है.

भारत में सामान्य बीमा का इतिहास

What is General Insurance?

भारत में सामान्य बीमा की शुरुआत 17वीं शताब्दी में पश्चिम में हुए औद्योगिक क्रांति और समुद्री व्यापार के विकास के दौरान हुई. सन् 1850 ईस्वी में ट्रिटन इंश्योरेंस कंपनी की कलकत्ता में स्थापना के साथ ही ब्रिटिश राज के समय में इसकी अवधारणा भारत में आई. सन 1907 में इंडियन मरकैंटाइल इंश्योरेंस की स्थापना हुई. यह पहली कंपनी थी जो सभी तरह की सामान्य बीमा ऑफर करती थी. 1957 में सामान्य बीमा परिषद (इंश्योरेंस एसोसिएशन ऑफ इंडिया की एक शाखा) का गठन किया गया जिसका उद्देश्य निष्पक्ष एवं सुदृढ़ कारोबार पद्धति के लिए नियम एवं आचरण संबंधी ढांचा तैयार करना था.

निवेश को नियंत्रित करने तथा ऋण चुकाने की क्षमता को निर्धारित करने के लिए ग्यारह वर्षों के बाद बीमा अधिनियम में संशोधन किया गया और टैरिफ सुझाव समिति की स्थापना की गई. सन् 1972 में सामान्य बीमा कारोबार (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम के पारित होने के साथ ही 1 जनवरी 1973 से बीमा उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया गया. एक सौ सात बीमा कंपनियों को आपस में समाहित कर चार कंपनियाँ बनाई गईं: नेशनल इंश्योरेंस कंपनी, न्यू इंडिया इंश्योरेंस कंपनी, ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी और यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेस कंपनी. भारतीय सामान्य बीमा निगम को 1971 में निगमित किया गया जो 1 जनवरी 1973 से प्रभावी है.

What is General Insurance?

1990 के आरंभ में बीमा क्षेत्र को फिर से खोला गया. 1993 में सरकार ने वित्तीय क्षेत्र में हो रहे सुधार के एक पूरक के रूप में बीमा क्षेत्र में सुधार करने के लिए सिफ़ारिश करने हेतु भारतीय रिज़र्व बैंक के भूतपूर्व गवर्नर श्री आर एन मल्होत्रा की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया. समिति ने बीमा क्षेत्र में निजी क्षेत्र के प्रवेश की सिफ़ारिश के साथ अपनी रिपोर्ट 1994 में प्रस्तुत की. विदेशी कंपनियों को भारतीय कंपनियों के साथ साझेदार के रूप में संयुक्त उपक्रम की स्थापना की अनुमति देने की भी सिफ़ारिश की गई.

मल्होत्रा समिति की सिफ़ारिशों के अनुसरण में 1999 में बीमा उद्योग के नियंत्रण एवं विकास के लिए बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (इरडा) का गठन किया गया जिसे अप्रैल 2000 में निगमित किया गया. इरडा का उद्देश्य ग्राहक की संतुष्टि में वृद्धि के लिए प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना, पसंद के अनुसार चुनने का अधिकार एवं कम प्रीमियम पर सेवा उपलब्ध कराते हुए बीमा मार्केट की वित्तीय सुरक्षा को सुनिश्चित करना है.

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इरडा ने अगस्त 2000 में पंजीकरण के लिए आवेदन मंगाते हुए बीमा बाजार को खोल दिया जिसमें विदेशी कंपनियों को 26 प्रतिशत तक के स्वामित्व के लिए अनुमति दी गई. प्राधिकरण ने सन् 2000 से बीमा अधिनियम,1938 की धारा 114ए के तहत विनियम की शक्ति के साथ कंपनी के पंजीकरण से लेकर पॉलिसी धारक के हित की सुरक्षा तक जैसे विनियमों के लिए ढांचा तैयार किया है.

दिसंबर 2000 में जनरल इंश्योरेस कॉर्पोरेशन के अनुषंगियों को स्वतंत्र कंपनी के रूप में पुनर्संरचित किया गया तथा जीआईसी को राष्ट्रीय पुनः-बीमाकर्ता (नेशनल री-इंश्योरर) के रूप में परिवर्तित किया गया. संसद ने जुलाई 2002 में जीआईसी से चारों अनुषंगियों को अलग (डी-लिंक) करने के लिए बिल को पारित किया. देश में इक्सपोर्ट क्रेडिट गारंटी कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया तथा एग्रिकल्चर इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया सहित 28 सामान्य बीमा कंपनियाँ तथा 24 जीवन बीमा कंपनिया कार्यरत हैं. बैंकिंग सेवा के साथ इंश्योरेंस सेवा का देश की जीडीपी में लगभग 70% योगदान है.

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